बेरोजगारी के प्रकार

(types of unemployment)

बेरोजगारी के प्रकार

कार्य की प्रकृति एवं अवधि के आधार पर बेरोजगारी के अनेक प्रकार प्रकट होते है।  भारत में बेरोजगारी के प्रकारों को निम्न रूप से समझा जा सकता है ।           

1.मौसमी बेरोजगारी :

मौसमी बेरोजगारी कृषि क्षेत्र और कुछ विशेष उत्पादक इकाईयों –चीनी एवं बर्फ के कारखानों में देखी जाती है। कृषि क्षेत्र, चीनी व बर्फ के कारखानों में काम की प्रकृति ऐसी है कि वहां काम करने वालो श्रमिकों को एक वर्ष में 4-6 महीने बेकार रहना पड़ता है ।   

2.चक्रीय बेरोजगारी :

चक्रीय बेरोजगारी व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्रों में पाई जाती है। जब व्यापार में तेजी-मंदी या उत्तार-चढाव होता है, तब बेरोजगारी का चक्रवात सामने आता है। जब मंदी होती है तब बेरोजगारी बढ़ जाती है । जब तेजी आती है तो बेरोजगारी घट जाती है। व्यापार की इन चक्रीय दशाओं की उत्पत्ति से संबंधित अनेक सिद्धांत  है –जलवायु का सिद्धांत,अधिक बचत या कम उपभोग का सिद्धांत, मुद्रा का सिद्धांत, मनोवैज्ञानिक सिद्धांत आदि ।  इनमें कभी कोई मुख्य हो जाता है ।

3.संरचनात्मक बेरोजगारी :

संरचनात्मक बेरोजगारी मूल रूप से आर्थिक ढांचे से संबंधित है। जब आर्थिक ढाँचे में दोष या विकास के कारण परिवर्तन होता है, तब बेरोजगारी देखने को मिलती है। ऐसा देखा जाता है कि किसी समय में किसी विशेष उद्योग का विशेष रूप से विकास होता है, तो किसी दूसरे उद्योग का ह्रास होता है। ह्रास होने वाले उद्योग के मजदूर बेकार हो जाते है –जैसे भारत में कपड़े के उद्योग में मशीनों के आ जाने से जुलाहों का सफाया हो गया ।

4.प्रोद्योगिक बेरोजगारी :

    जब यंत्रों, मशीनों व उपकरणों की प्रकृति में परिवर्तन आता है तो तकनीक विशेष की जानकारी रखने वाले मजदूर बेकार हो जाते है।  पूर्व में चमड़े व जूत्ते बनाने का मोची अपने हाथों से करते थे। आज ये काम मशीनों द्वारा होने लगे, जिसमें ये काम कम समय, कम लागत व अच्छे ढंग से होने लगे।  इसके फलस्वरूप मोची वर्ग के कार्यक्षेत्र कम हो गये और उनमें बेरोजगारी बढ़ी ।

5.अर्द्ध-बेरोजगारी :

 जब कोई व्यक्ति प्रचलित मजदूरी से भी कम मजदूरी पर काम करने लगता है, तो ऐसी अवस्था को ही अर्द्ध-बेरोजगारी कहाँ जाता है।  ‘बैठे से बेगार भली’ के सिद्धांत पर व्यक्ति कार्य स्वीकार कर लेता है। जैसे स्नातकोत्तर पास व पीएचडी उपाधि प्राप्त व्यक्ति का निजी स्कूलों में दो या तीन हज़ार मासिक पर कार्यशील होते देखा जाना।

6.छिपी बेरोजगारी :

  छिपी बेरोजगारी के अंतर्गत आवश्यकता से अधिक लोग एक ही तरह के कार्य संपादन में देखे जाते है। इस प्रकार की स्थिति ग्रामीण कृषि-अर्थव्यवस्था में देखी जा सकती है। गाँव में उतने भूमि के हिस्से पर कई  व्यक्ति काम करते है जिसमें केवल एक व्यक्ति कर सकता है।  जिससे उनके द्वारा उत्पादन में कोई वृद्धि नहीं होती है। यदि उसमें एक के अलावा अन्य को हटा दिया जाए तो कृषि-उत्पादन में कोई कमी नहीं आएगी ।

7.घर्षणात्मक बेरोजगारी :  

उत्पादन की तकनिकी में तेजी के साथ परिवर्तन घर्षणात्मक बेरोजगारी को जन्म देती है। जब किसी भी उद्योग में उत्पादन की स्थिति और मशीने बदलती है तो पुराने श्रमिक कुछ समय के लिए बेकार हो जाते है ।  किन्तु शीघ्र ही उत्पादन की नयी तकनीकों में प्रशिक्षण प्राप्त कर वे अपने लिए नया रोजगार खोज लेते है ।

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