एवरेस्ट पर चढ़ने वालों में टॉप 5

एवरेस्ट पर चढ़ने वालों में टॉप 5


माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाले सबसे ज्यादा विदेशी पर्वतारोहियों की सूची में भारत पहले पांच में शामिल हो गया है. इस सीजन में भारत के 19 पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढा़ई की. नेपाली नंबर वन.
  1. Arunima Sinha
  2. Bachendri Pal
  3. Sir Edmund Percival Hillary
  4. Tenzing Norgay
  5. Apa nicknamed "Super Sherpa"

भारत के पड़ोसी देश नेपाल पर्वतारोहरण संघ के अध्यक्ष रहे आंग शेरिंग शेरपा ने बताया कि नेपाल के बाद अमेरिका, ब्रिटेन और भारत टॉप पर हैं. 156 में से एवरेस्ट पर पहुंचने वालों में भारत के पड़ोसी देश नेपाल के सबसे ज्यादा पर्वतारोही हैं. इसके बाद 39 अमेरिकी, 27 ब्रिटेन और 19 भारत के हैं.

29 मई 1953 को पहली बार माउंट एवरेस्ट पर न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली मूल के भारतीय नागरिक तेनसिंह नोर्गे शेरपा चढ़े थे. उसके बाद से अब तक 3,448 पर्वतारोही 5,585 बार एवरेस्ट पर चढ़ चुके हैं. नेपाल के अप्पा शेरपा ने 21 बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने का रिकॉर्ड स्थापित किया 

हरियाणा से भारत के पति पत्नी बिकाश कौशिक और उनकी पत्नी सुषमा कौशिक एवरेस्ट पर चढ़ने वाले सबसे युवा दंपत्ति बने. जबकि 45 साल की प्रेमलता अग्रवाल ने सबसे उम्रदराज एवरेस्ट पर्वतारोही का रिकॉर्ड बनाया. 20 मई 2019 को कौशिक दंपत्ति के साथ ही वह भी एवरेस्ट की चोटी पर पहुंची.

अरुणाचल प्रदेश की 32 वर्षीय अंशु जामसेपना पहली महिला बनी जिन्होंने एक ही सीजन में दो बार एवरेस्ट पर चढ़ाई की. और उन्हीं के प्रदेश की टीने मेना अपने राज्य से एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली महिला बनी.

फ्लाइट लेफ्टिनेट निवेदिता चौधरी पहली महिला पायलट हैं जिन्होंने एवरेस्ट की उंचाई पर जीत का तिरंगा फहराया .

नेपाल की सरकार को इस वर्ष वर्षाऋतु में 23 लाख 81 हजार अमेरिकी डॉलर माउंटेनियरिंग की रॉयल्टी के तौर पर मिले हैं.

कुछ अनुभवी पर्वतारोहियों का कहना है कि कुछ ऐडवेंचर कंपनियां अप्रशिक्षित पर्वतारोहियों को भेज रहीं हैं, जो माउंटेन पर हर किसी के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इतना ही नहीं, नेपाल की सरकार का ध्यान भी हर पर्वतारोही से डॉलर कमाने पर है और यही वजह है वह एवरेस्ट फतह के लिए ज्यादा संख्या में परमिट जारी कर रही है।

नेपाल एशिया के सबसे गरीब देशों में से एक है और एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान नियमों के उल्लंघन, कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार का लंबा इतिहास रहा है। इसी का परिणाम है कि 29,000 फीट की ऊंचाई पर अनियंत्रित भीड़ जमा हो गई। इस ऊंचाई पर हालात कितने खतरनाक हो सकते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल एक या दो घंटे की देरी के कारण मौत हो सकती है।

पर्वतारोही बताते हैं कि उन्हें ऑक्सिजन के कनस्तर लेकर जाना होता है पर इसके साथ समयसीमा का फैक्टर भी महत्वपूर्ण होता है। कुछ शेरपा और पर्वतारोहियों के मुताबिक इस साल कुछ मौतें इस कारण हो गईं क्योंकि आखिरी के 1,000 फीट पर उन्हें लंबे समय तक लाइन में खड़ा होना पड़ा। इस कारण वे जल्दी से वापस नहीं आ सके और उनकी ऑक्सिजन की आपूर्ति भी खत्म हो गई। कुछ लोग ऐसे भी माउंटेन पर पहुंच गए थे, जो इसके लिए फिट नहीं थे।
नेपाली पर्वतारोही गाइड का कहना है कि कुछ पर्वतारोहियों को चढ़ाई के बारे में बेसिक जानकारी भी नहीं थी। दिग्गज पर्वतारोहियों का साफ कहना है कि कौन लोग एवरेस्ट की चढ़ाई करें, इसको लेकर नेपाल में कोई कड़ा कानून नहीं है और इसी कारण यह त्रासदी हुई। इससे पहले 2015 में हिमस्खलन के कारण एवरेस्ट पर 10 लोगों की मौत हो गई थी।

एक जानेमाने एवरेस्ट पर्वतारोही ऐलन अरनीट कहते हैं, 'आयरनमैन के लिए आपको क्वालिफाई होना पड़ेगा। न्यू यॉर्क मैराथन दौड़ने के लिए आपको निपुण होना होगा लेकिन दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ाई करने के लिए आपको किसी योग्यता की जरूरत नहीं है।'

अरूणिमा सिन्हा भारत से राष्ट्रीय स्तर की पूर्व वालीबाल खिलाड़ी तथा माउंट एवरेस्ट चढ़ाई कर फतह करने वाली पहली भारतीय विकलांग हैं।
Arunima Sinha
Arunima Sinha का जन्म सन 1988 में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ अरुणिमा की रुचि बचपन से ही स्पोर्ट्स में रही वह एक नेशनल वॉलीबॉल प्लेयर भी थी। उनकी लाइफ में सब कुछ समान्य चल रहा था। तभी उनके साथ कुछ ऐसा घटित हुआ जिसके चलते उनकी जिंदगी का इतिहास ही बदल गया। क्या थी वह घटना जिसके चलते उन्होंने नए कीर्तिमान रच दिये आइए जानते हैं।
अरुणिमा सिन्हा 11 अप्रैल 2011 को पद्मावती एक्सप्रेस (Padmavati Express) से लखनऊ से दिल्ली जा रही थी रात के लगभग एक बजे कुछ शातिर अपराधी ट्रैन के डिब्बो में दाखिल हुए और अरुणिमा सिन्हा को अकेला देखकर उनके गले की चैन छिनने का प्रयास करने लगे जिसका विरोध अरुणिमा सिन्हा ने किया तो उन शातिर चोरो ने अरुणिमा सिन्हा को चलती हुई ट्रैन बरेली के पास बाहर फेक दिया जिसकी वजह से अरुणिमा सिन्हा का बाया पैर पटरियों के बीच में आ जाने से कट गया पूरी रात अरुणिमा सिन्हा कटे हुए पैर के साथ दर्द से चीखती चिल्लाती रही लगभग 40 – 50 ट्रैन गुजरने के बाद पूरी तरह से अरुणिमा सिन्हा अपने जीवन की आस खो चुकी थी लेकिन शायद अरुणिमा सिन्हा के जीवन के किस्मत को कुछ और ही मंजूर था
फिर लोगो को इस घटना के पता चलने के बाद इन्हें नई दिल्ली (New Delhi) के AIIMS में भर्ती कराया गया जहा अरुणिमा सिन्हा अपने जिंदगी और मौत से लगभग चार महीने तक लड़ती रही और जिंदगी और मौत के जंग में अरुणिमा सिन्हा की जीत हुई और फिर अरुणिमा सिन्हा के बाये पैर को कृत्रिम पैर के सहारे जोड़ दिया गया
अरुणिमा सिन्हा के इस हालत को देखकर डॉक्टर भी हार मान चुके थे और उन्हें आराम करने की सलाह दे रहे थे जबकि परिवार वाले और रिस्तेदारो के नजर में अब अरुणिमा सिन्हा कमजोर और विंकलांग हो चुकी थी लेकिन अरुणिमा सिन्हा ने अपने हौसलो में कोई कमी नही आने दी और किसी के आगे खुद को बेबस और लाचार घोसित नही करना चाहती थी
“मंजिल मिल ही जाएगी भटकते हुए ही सही, गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं।”
अरुणिमा यहीं नहीं रुकीं। युवाओं और जीवन में किसी भी प्रकार के अभाव के चलते निराशापूर्ण जीवन जी रहे लोगों में प्रेरणा और उत्साह जगाने के लिए उन्होंने अब दुनिया के सभी सातों महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटियों को लांघने का लक्ष्य तय किया है। इस क्रम में वे अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो (Kilimanjaro: To the Roof of Africa) और यूरोप की एलब्रुस चोटी (Mount Elbrus) पर तिरंगा लहरा चुकी हैं।
दोस्तों अरुणिमा अगर हार मानकर और लाचार होकर घर पर बैठ जाती तो आज वह अपने घर-परिवार के लोगों पर बोझ होती। सम्पूर्ण जीवन उन्हें दूसरों के सहारे गुजारना पड़ता। लेकिन उनके बुलंद हौसले और आत्मविश्वास ने उन्हें टूटने से बचा लिया। दोस्तों मुश्किलें तो हर इंशान के जीवन में आतीं हैं, लेकिन विजयी वही होता है जो उन मुश्किलों से, बुलन्द हौसलों के साथ डटकर मुकाबला करता है। अरुणिमा सिन्हा हमारे देश की शान है और हमें उनसे जीवन में आने वाले दुःखों और कठिनाइयों से लड़ने की प्रेरणा लेनी चाहिए। हम तहे दिल से अरुणिमा सिन्हा को सलाम करते हैं।
इस तरह अरुणिमा ने वापस लौटने में सफलता हासिल की और सभी को चौंकने पर मजबूर कर दिया। Arunima ने साबित कर दिया कि अगर इंसान सच्चे दिल से चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता। चाहे वह औरत हो या आदमी या फिर कोई विकलांग। अरुणिमा का कहना है कि-" इंसान शरीर से विकलांग नहीं होता बल्कि मानसिकता से विकलांग होता है"।अरुणिमा की इच्छा है की वह विश्व की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करें। जिनमें से चार उन्होंने सफलतापूर्वक फतेह कर ली है।

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